Anjju Taneja

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अहोई अष्टमी की व्रत कथा ~~~~

अहोई अष्टमी की कथा सुनने से पहले अपने हाथ में सात प्रकार के अनाज ले लें। अगर यह संभव नहीं है तो थोड़े से अक्षत ले लें
प्राचीन समय की बात है एक नगर में साहूकार के सात बेटे और उनकी सात बहुएं और एक बेटी रहती थी। बेटी की भी शादी हो चुकी थी लेकिन दीपावली पर अपने मायके आई हुई थी। साहुकार की बहुएं दीपावली की साफ-सफाई कर रही थीं। ननद भी भाभियों के साथ घर की लीपापोती के लिए जंगल से साफ मिट्टी लेने गईं। जंगल में मिट्टी निकालते वक्त खुरपी से स्याहु का एक बच्चा मर गया।
इस घटना से दुखी होकर स्याहु की माता ने क्रोधित होकर कहा कि मैं तुम्हारी कोख बांध दूंगी।स्याहु के वचन सुनकर साहुकार की बेटी सभी भामियों से एक-एक करके विनती करने लगी कि वह मेरी जगह अपनी कोख बंधवा लें। क्योंकि साहुकार की बेटी की कोई संतान नहीं थी और उसकी सभी भाभियों की संतान थी। ज्यादा विनती करने पर सबसे छोटी भाभी से अपनी ननद का दुख देखा नहीं गया और उसने ननद की जगह अपनी कोख बंधवा ली।
इसके बाद छोटी भाभी के बच्चे होते हैं, वे सभी सात दिन बाद मर जाते हैं। सभी बच्चों के एक-एक करके मर जाने पर साहुकार ने एक ज्ञान पंडित को बुलाया और इसका कारण पूछा। तब पंडितजी ने कहा कि उनको सुरही गाय की सेवा करनी चाहिए। वह सुरही गाय की सेवा में लग जाती है और उसका पूरा ध्यान रखती है।
इसे देखकर सुरही गाय छोटी बहू से पूछती है आखिर तू किस कारण से मेरी इतनी सेवा कर रही है और तू मुझसे क्या चाहती है। जो कुछ तेरी इच्छा है वह मुझसे मांग ले। साहुकार की बहु ने कहा कि स्याहु माता ने मेरी कोख बांध दी है, जिससे मेरे सभी बच्चे मर गए। यदि आप मेरी कोख खुलवा दें तो मैं आपका बहुत उपकार मानूंगी।
बेहद शुभ संयोग में इस बार अहोई अष्टमी, इन कार्यों के लिए लाभदायीसुरही गाय छोटी बहू की बात मान लेती है और उसे लेकर वह सात समुद्र पार स्याहु माता के पास लेकर चली जाती है। रास्ते में उसे एक गरुड़ पक्षी के बच्चे सांप को मारने वाली होती लेकिन साहुकार की बहू सांप को मार देती है और गरुड़ पक्षी के बच्चे को जीवनदान देती है।
इससे प्रसन्न होकर गरुड़ पक्षी की मां उनको सुरही समेत स्याहु के पास पहुंचा देती है। वहां पहुंचकर छोटी बहू स्याहु की भी सेवा करने लग जाती है। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर स्याहु उसको सात पुत्र और सात बहू का आशीर्वाद देती है। स्याहु कहती है कि तुने मेरी काफी सेवा कर ली है, अब तू घर जा और माता अहोई का उद्यापन कर। पूजा में सात-सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देना।
छोटी बहू जब घर जाती है तो देखती है कि उसके सातों संतान जीवित हैं और उनकी सात बहुएं भी हैं। वह यह सब देखकर खुश हो जाती है और उसने सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देकर माता अहोई का धूमधाम से उद्यापन करती है।
कथा सुनने के बाद अक्षत माता को चढ़ा दें या फिर सात अनाज गाय को खिला दें। फिर कहें कि हे अहोई माता जिस प्रकार आपने साहूकार की छोटी बहू को आशीर्वाद दिया, उसी तरह हमारी भी संतान की रक्षा करना और उसे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देना। साथ ही जिस तरह छोटी बहु की कोख खोल दी, उसी तरह सभी नारियों की इच्छा पूरी करना।

जय अहोई माता की जय

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